परमात्मा को साकार रूप में भूतल पर लाने का कार्य गोमाताजी ने ही किया ….. जानते है कुछ प्रमाण

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क्या आप जानते है परमात्मा को साकार रूप में गोलोक या वैकुण्ठ से पृथ्वी पर बुलाना हो या प्रतिमा रूप में भू-गर्भ से भूतल पर लाना हो तो यह काम सिर्फ गोमाताजी ही कर सकती हैं। जब रावण का आंतक पृथ्वी पर बढ़ा तब देवता व ऋषियों की पुकार को भी प्रभु ने अनसुना कर दिया तब पृथ्वी माताजी को गोमाताजी का रूप लेकर जाना पड़ा।

‘‘धेनु रूप धरि हृदय विचारी, गई तहां जहां सुर मुनि जारी’’

तभी प्रभु धरती पर नराकार (राम) रूप लेकर पधारे और रावण के आतंक को समाप्त किया। इसके अतिरिक्त प्रभु प्रतिमाओं को भूगर्भ से भूतल पर लाने के तो अनेकों प्रमाण है।
कुछ प्रमाण जानिये- मेवाड़ के ‘‘कुरूक्षेत्र’’ हल्दीघाटी के समीप मेवाड़ी यमुना (बनास नदी) के किनारे बसा सुन्दर गोकुल स्वरूप नगर श्री नाथद्वारा और वहाँ विराजमान है प्रभु श्रीनाथ जी । श्रीनाथ जी का यह विग्रह पूर्वकाल में वृंदावन के जतीपुरा ग्राम के भू-गर्भ में (जमीन के भीतर) था। वहाँ एक ग्वाला नित्य गौमाताजी को चराने के लिए ले जाता था। उनमें से एक गोमाता जी एक निश्चित स्थान पर जाकर अपने स्तनों से अपने आप दूध गिराती थी। गोमाताजी का यह क्रम नित्य जारी रहने पर ग्वाले को अचरज हुआ। उसने कौतूहलवश उस स्थान की खुदाई कराई तो उस खुदाई में प्रभु श्रीनाथ जी की विशाल कृष्ण पाषाण निर्मित प्रतिमा प्रगट हुई। प्रतिमा के प्रकटीकरण के साथ ही वह पूरा क्षेत्र प्रभु श्री जी सरकार (श्रीनाथ जी) के जयकारे से गूंज उठा।
इसी तरह मेवाड़ अधिपति भगवान एकलिंगनाथ जी, मीराबाई जी की जन्मस्थली मेड़ता में विराजमान श्री द्वारिकाधीशजी, राजस्थान के ही टोंक जिले के श्री खेड़ापति बालाजी आदि की प्रतिमाएँ भक्तों के दर्शन हेतू गोमाताजी ने अपनी दुग्ध धारा प्रवाहित करके ही पृथ्वी पर प्रकट की है। तेजाजी, गोगाजी, कल्लाजी, भाँतीजी, भोजाजी, पाबूजी यह सब लोक-देवता पूर्व में मानव ही थे पर यह सभी गोमाताजी के लिए जियें और गोमाताजी के लिए ही इन्होनें अपने प्राण दिए तो आज दुनिया उनके मन्दिर बनाकर पूज रही है। हजारों लोगों के दुःख दर्द इनके नाम लेने मात्र से समाप्त हो रहे है और लोगों के प्राण बच रहे है। सरलता से कहूं तो इन्सान को भगवान के बराबर शक्ति दे दे वो है भगवती गोमाताजी।
विघ्नहर्ता गौरीपुत्र शिवसुत प्रथम पूजनीय भगवान गणाधिनायक गणेश जी भगवान की उत्पत्ति गौमाताजी की कृपा से ही हुई हैं। गणेश जी को प्रथम पूजनीय बनाने में गोमाताजी की भूमिका रही है। भगवान भोलेनाथ सदा नन्दी भगवान को अपने साथ विराजमान रखते है। नाथ सम्प्रदाय के गुरू गोरक्षनाथ जी की महिमा गोमाता जी से है। प्रभु दत्तात्रेय जी ने भी सदा गौमाताजी के साथ ही विचरण किया। प्रभु श्री राम जी ने निराकार रूप से नराकार, आकार, साकार रुप गौमाताजी की सेवा के लिए ही तो अपनाया था ।

‘‘ विप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार’’
‘‘गो द्विज धेनु देव हितकारी,कृपा सिन्धु मानुष तनुधारी’’

यह सब इस बात का प्रमाण है कि गोमाताजी स्वयं ही ईश्वर है जो एक साथ असंख्य रूप धारण कर पृथ्वी पर दीर्घकाल से लीला कर रही है ।

  

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