गौ माता जी की मानव जीवन में क्यों आवश्यकता है ?

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हमारे जीवन में निरन्तर दुःख क्यों बढ़ रहे हैं। आज सामान्यतया मानव की सोच बन गई है कि गाय से तो ज्यादा दूध भैंस, जर्सी, होलिस्टन आदि पशु देते हैं। भैंस तो दूध ज्यादा भी देती है और जाड़ा भी देती है। भैंस के दूध में तो फेट भी ज्यादा आती है। ओर फेट के चक्कर में पड़ने के बाद तो आजकल शरीर की फेट तो बढ़ रही है और सनातन परम्परा को बरकरार रखने वाले फेटे ( पगड़ी, साफा ) उतर गए यानि इज्जत खत्म हो गई। आप ही सोचो आज से कुछ वर्षों पहले बुजुर्गों की कितनी इज्जत किया करते थे। बड़े बुजुर्ग रास्ते से निकलते तो लोग खड़े हो जाया करते थे। माताएं बहने अपने कपड़े (साड़ी, ओढ़नी, लुगड़ी) को पकड़कर एक तरफ ठहर जाती थीं कि दादाजी निकल रहे हैं मेरे वस्त्र दादाजी को स्पर्श होगें तो दादाजी की इज्जत कम हो जाएगी…ऐसा होता था ना। अब तो हालात यह है कि दादाजी को खुद ही पेन्ट, पजामा या धोती पकड़कर एक तरफ रूक जाना पड़ता है कि छोरा-छोरी, बहू-बिदंणी निकल जावें तो मैं निकलूं। नहीं तो कहीं टक्कर मार जाएगी।
गौमाताएं, नन्दी, बछड़े, बछियां असंख्य मिल जाएंगे सड़को पर, बाजारों में, खेत-खलिहानों में, राजमार्गों पर सूने लावारिस हालत मेें घूमते हुए। अब वो दूध दुह कर छोड़ी हुई अथवा अनुुपयोगी समझकर वृद्धा अवस्था में छोड़ी हुई गौमाताजी जब सब्जी-फल वालों की दुकान, किसी लाॅन वाले मकान या फिर किसी खेत-खलिहान की तरफ जाएगी तो क्या वो दुकान, मकान या खेत खलिहान वाला गोमाताजी का स्वागत करेगा? सत्कार करेगा? गोमाताजी को कहेगा कि माँ पधारो आप तो सर्वदेवमयी हो, सारे विश्व की माँ हो। हमारे खेत में, खलिहान में आराम से जीमों। दुकान वाला कहेगा कि माँ एक केला या आलू खालो….नहीं ना। जमींदार, दुकानदार, सब्जीवाला, फलवाला कोई भी हो आप भी उसमें शामिल हैं। डण्डा लकड़ी बेंत लेकर गोमाताजी को मारने दौडेगे। कभी-कभार तो पत्थर भी मार देते हैं। मुंह से गन्दी-गन्दी गालियां भी गौमाताजी को बोलते हैं। कुछ आसुरी वृति के लोग होते हैं,उनके हाथ में अगर कुल्हाड़ी, दरोंती, हंसिया हो तो उससे गोमाताजी पर प्रहार कर बैठते हैं। और गोमाताजी को घायल लहुलुहान कर देते हैं। कुछ दुष्ट तो गौमाताजी व नन्दी बाबा पर तेजाब तक डाल देते हैं। एक ओर तो हम कहते हैं की गौ हमारी माँ है,ओर है ही।
आप स्वयं सोचिए- बकरी का बच्चा जन्मते ही मिमियाता है, घोड़ी का बच्चा हिनहिनाता है, गधे का बच्चा रेकंता है, कुतिया का बच्चा भौंकता है, हथिनी का बच्चा चिघांड़ता है, शेरनी का बच्चा दहाड़ता है, नारी का बच्चा रोता है, भैंस का बच्चा सोता है लेकिन गोमाताजी का बच्चा जन्म के पश्चात प्रणवघोष करता है माँऽऽऽऽ यािन वो कहता है कि यह मेरी माँ सारे जगत की माँ हैं। मानव पुत्र को तो माँ बोलने के लिए सिखाना पड़ता है लेकिन गोवत्स तो स्वयं शिक्षित होता है स्वयं बोल देता है माँऽऽऽ ।
शास्त्र प्रमाणित करते हंै कि गौमाताजी सारे जगत की माता है। गोवत्स वाणी स्वयं इस बात का प्रमाण है कि गौ हमारी माता है। जब गो आपकी माँ है और वह पेट भरने को कचरा, प्लास्टिक खा रही है। 100 करोड़ हिन्दु पुत्र होते हुए भी लावारिसों की तरह सड़कों पर धक्कें खा रही है। सब्जी-फल वालों का डण्डा खा रही है। खेत-खलिहानों से धकेली जा रही है। जब माँ की इज्जत आप नही कर रहे हैं तो मानव तो गोमाता का पुत्र है। माँ की इज्जत नही हो रही है तो सन्तान की इज्जत कहां से होगी।
जब तक गोमाताजी की इज्जत थी भारतवर्ष में बुजुर्गों की भी बहुत इज्जत थी परन्तु जब से गोमाताजी की इज्जत समाप्त हुई, गोमाताजी को लावारिस छोड़ना शुरू हुआ है, उनको मारना पीटना गाली देना शुरू हुआ है उसके बाद आपकी, आपके बुजुर्गों की इज्जत भी समाप्त हो गई है। कंटीली विषैली झाड़ियों को सींचकर कोई आम खाना चाहे तो नहीं मिल सकता है। ठीक उसी प्रकार गौमाताजी का अपमान करके इस संसार में सम्मानपूर्वक कोई कैसे जी सकता है।
गोमाताजी है तो प्रेम है, गोमाताजी है तो दया है, गोमाताजी है तो शर्म है, गोमाताजी है तो धर्म है, गोमाताजी है तो प्रसन्नता है, गोमाताजी है तो इज्जत है, सम्मान है। अब तो आपके समझ में आ ही गया होगा कि गोमाताजी दूध के लिए नहीं दर्शन, पुण्य-अर्जन और मानवीय जीवन के लिए आवश्यक है। गोमाताजी अगर दूध देवे तो उन भगवती जोगमाया जी का प्रसाद समझ कर स्वीकार करो। उस दुग्ध का अमृत पान करो। ओर दूध नहीं देवें तो भी कोई बात नही। आशीर्वाद तो देगी ही।

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